मिट्टी के दीपक: तजुर्बे के हाथों से आकार ले रही परम्परा, चाक पर आज भी जगमगाने की उम्मीद
ललित चावला बिजौलिया | 29 Oct 2026
बिजौलिया। दीपावली नजदीक आते ही कुम्हार परिवारों के चाक घूमने लगते हैं और मिट्टी दीपकों का आकार लेने लगती है। CNX DIGITAL के कैमरे में कस्बे के वरिष्ठ नागरिक छीतरलाल कुम्हार की ऐसी ही तस्वीर कैद हुई, जहां उनके अनुभवी हाथ चाक पर मिट्टी को दीपक का रूप देते नजर आए।
वर्षों से चली आ रही इस पारम्परिक कला को अब कस्बे में गिने-चुने परिवार ही जीवित रखे हुए हैं। मिट्टी की उपलब्धता में कमी, अधिक मेहनत और निर्माण की लंबी प्रक्रिया के चलते कई परिवार इस काम से दूर हो गए हैं। दीपक बनाने के लिए विशेष पीली मिट्टी की जरूरत होती है, जो पहले बिजौलिया क्षेत्र में आसानी से मिल जाती थी, लेकिन अब इसके लिए दूर जाना पड़ता है और मिट्टी भी कम मात्रा में उपलब्ध होती है।
ऐसे में छीतरलाल कुम्हार जैसे कारीगरों के हाथों घूमता चाक केवल दीपक ही नहीं गढ़ रहा, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परम्परा को भी सहेज रहा है। माटी कला में रुचि ले केने वाले कस्बे के मुकेश कुम्हार और दिनेश प्रजापति का कहना है कि दीपावली की रोशनी के बीच मिट्टी के दीपक बनते देखना हमारी लोककला, मेहनत और विरासत से जुड़ने का एक सुकूनभरा अहसास है।