फादर्स-डे विशेष: पिता परिभाषा में नहीं बंधता, हर परवाह का विस्तार पिता हैं

ललित चावला बिजौलिया | 21 Jun 2026

पिता परिभाषा में नहीं बंधता, हर परवाह का विस्तार पिता हैं

बिजौलिया (एम रेडवाल)। संसार की समस्त मौन और अदृश्य संवेदनशीलता अगर मौजूद हैं तो वो पिता में हैं। हर परवाह को जन्म देती हैं संवेदनशीलता और पिता हर परवाह का अनन्त विस्तार हैं। 

पिता के होने और नहीं होने से बहुत फर्क पड़ता हैं। संसार की समस्त खुशियां और ग़म पिता के होने,न होने से जुड़े हैं। बहुत भाग्यशाली हैं वो लोग जिनके पिता उनके साथ है। बहुत अभागे हैं वो लोग जो पिता के होते हुए उनकी बेकद्री करते हैं। एक मौन संदेश यह अवसर देता है कि पिता की परवाह में शामिल कर लिया जाए  खुद को क्योंकि ईश्वर यह अवसर लंबे समय तक नहीं देता हैं। 

पिता के होते हुए नज़र अंदाज़ कर दिया जाना बहुत कष्टदायक स्थिति है।ऐसी स्थिति ईश्वर के साथ साथ मानवता की नजर में भी असहज बना देती हैं। पिता के नहीं होने पर व्यक्ति पिता के रूप में दिए ईश्वर के अनमोल वरदान को खो देता है। सच तो यह है कि एक पिता की समग्र चेतना सबकी परवाह की परिधि में रची-बसी होती हैं।  पिता का नहीं होना पिता के अस्तित्व का मिट जाना भी नहीं है। पिता तो संसार की जैविक संरचनाओं के रूप में अपनी संतानों में सदैव विद्यमान रहता आया है।

पिता के प्रति मौन अथवा प्रकट आभार प्रदर्शित करना ईश्वर के आशीर्वाद की नजदीकी पाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है। आज़ फादर्स डे यह अवसर देता है कि पिता के आशीर्वाद का अकूत खजाना अपने दोनों हाथों से भर-भरकर समेट लें।

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